Pages

Monday, June 27, 2011

राती सुप्न्यों माँ आँदी तू...!!



क्यों जागते हो....
क्या सोचते हो....?                               
कुछ  हमसे कहो 
तन्हा न रहो....!!!

यादो के 
बरसते बादल को 
पलकों पे
सजाना ठीक नहीं.....!!!


 जो 
अपने बस की बात न हो
उस को 
दोहराना ठीक नहीं....!!!

अब रात की 
आँखे भीग चली.....
और चाँद भी 
है छुप जाने को.....


कुछ देर में...
शबनम आएगी....
फूलों की 
प्यास बुझाने को ....!!!

 ख्वाबों के 
नगर में खो जाओ...


"अब सो जाओ....!! अब सो जाओ....!!!


Tuesday, June 21, 2011

कुछ नहीं कहना

तुमने कहा था....
सब कुछ मुझ से कह देना..
कहा तो था....?
जाने क्या हुआ....
पर हमने..... 
अब सोच लिया है,

चाहे......

दिल की हर ख्वाहिश              
जिंदगी की आँख से...
अश्क बन कर बह जाये......
चाहे मुझ पर ,
मेरे इस बिस्तर पर....
घर की सारी दीवारें....
छत समेत गिर जाएँ...!!!

और बे-मुकद्दर हम...
इस मकान के मलबे में...
खुद ही क्यों न दब जाये....???

तुम से-----

"कुछ नहीं कहना" 







Sunday, June 19, 2011



सुनो.....
किस्मत से लड़ने की 
कभी ,
कोशिश  नहीं करते.....!!!   


मुकद्दर 
जो मुखालिफ हो....
दुआए... बे-असर जाएँ....
सभी मंजर 
बिखर जाएँ.....

तो ,
ऐसे में बगावत की  
कभी 
कोशिश नहीं करते.......!!!








किसी के                                
साथ चलने की                    
किसी के 
दिल में बसने की 
कभी ,
ख्वाहिश नहीं करते  ...!!!

किसी,
एक शख्श की खातिर 
सभी से दूर हो जाना..........
कहाँ  की.... ये मोहब्बत है...?

मोहब्बत 
ये  नहीं होती.........



"मोहब्बत ....दिल में होती है.....!!!



Tuesday, June 14, 2011

... याद के पिंजरे में ...!!!



हम  
तेरी याद के पिंजरे में  
क़ैद पंछी...  
उड़ना  
चाहें भी तो 
ये सोच के उड़ नहीं पाते....

बाहर 
 तन्हाई की  हवा होगी......
 बेरहम वक्त की फिजा होगी....
 कौन डालेगा 
 तेरे प्यार का 
दाना हमको.....  ???

तुझसे मिलेगा 
न मिलने का बहाना हमको.......
दिन कहा गुजरेगा 
 उसकी खबर ही नहीं....
 कैसे गुजरेगी रात ....???
 अपना  तो कोई घर    घरनहीं..........



बस
 यही  सोच के
 दिल को समझाते है अक्सर ....

 "हम  
 तेरी याद के  
 पिंजरे में कैद पंछी..."" 

Thursday, June 9, 2011

और फिर नहीं आई.......!!



बिना  एक लफ्ज बोले वो गई 
और फिर नहीं आई.........
बा-जाहिर आम लहजे में 
कहा था मैंने जब उस से.......

बदल लो रास्ता अपना.....!!!
जुदा राहें.. यही कर लो.....!!!
हमारे चाहने -न चाहने से 
कुछ नहीं  होता....!!!
यही सच है  की हम दो...
मुख्तलिफ रास्तों के राही है......
तो फिर 
क्यों दिल की... माने हम....???

शुरू में 
मानता हूँ मै 
अजीयत दिल को पहुचेगी....
मगर फिर वक्त गुजरेगा.......
सभी जख्मो को भर देगा.....!!!

मेरे इस आम से लहजे पे वो..
एक पल को चौंकी थी.....!!! 

मेरी आँखों में... आँखे डाल के 
हैरत से..पूछा था....
ये सब जो कह रहे हो .......
खुद को ये समझा भी  पाओगे...???

बहुत ही जी ...कड़ा करके....
मै उस दम मुस्कुराया था...
बहुत खुद पे ..जबर करके 
मै उस से कह ये पाया था.......!!!

 
 मेरी तुम फ़िक्र ..रहने दो...
संभल जाऊँगा मै खुद ही....
सभी जख्मो को सी लूँगा....
भुला कर सारी बातों को......
अकेला भी... मै जी लूँगा....!!!

बहुत ही बे-यकीन  आँखों से  
उसने मुझको देखा...और......
बिना एक लफ्ज बोले वो.....
गई और फिर नहीं आई.....!!!

और अब  तर्क -ऐ-ताल्लुक को...
अगरचे उम्र बीती है.......

मगर इस दिल पे उसकी जात का 
जो नख्श कायम था....
कभी धुंधला नहीं होता.....!!!

मुझे महसूस होता है ..
कि जैसे मेरे कानो में.....
 वो अपनी बोलती आँखों से......
सरगोशी सी करती है.........!!!

"वो सब जो कह रहे थे........
खुद को वो समझा भी पाए हो....???


   
 







Wednesday, June 1, 2011

कोई सोचेगा ....!!!


एक रोज तो 
कोई सोचेगा 
दीवानों की बस्ती में.....

एक शख्श 
था पागल पागल सा.....
पर बातें,
ठीक सी कहता था.....!!!

बारिश की तरह 
पुरशोर न था 
सागर की तरह 
चुप रहता था.......!!!
 जान ,
रोते रोते खो बैठा....
दिल हँसते हँसते हार दिया....!!

जो नज्म लिखी..
भरपूर लिखी ......
जो शेर दिया ,
शाहकार दिया.....!!!
क्यूँ 
जीते-जी दरगौर हुआ.... 
किस चाह में 
तन-मन  वार  दिया....???

था दुश्मन कौन.
उस पागल का....
किस दिल ने...
उसको मार दिया......???

एक रोज़ ,
तो कोई सोचेगा...

"दीवानों की बस्ती में....!!!"