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Thursday, March 3, 2011

साहिबों.......!!!

साहिबों.......!!!

ख्वाब परिंदों की तरह होते हैं
छूना चाहो तो ए उड़ जाते हैं
और फिर हाथ नहीं आतें हैं.......!!!

कभी एक ही शाख ऐ तमन्ना पर महकते हुए गाते रहना
दास्तान दूर के देशों की सुनाते रहना.....
हर नई रुत में नया गीत बना कर लाना.....
कभी हँसाना कभी देर तक रुलाते रहना.
.....उड़ती खुशबू के तरंग कैद नहीं हो सकती
किसी भी तीर से ए जैद नहीं हो सकती
कभी मंजिल कभी रास्तों की तरह होते हैं....!

साहिबों .....!!!
ख्वाब परिंदों की तरह होते हैं.........!!!!

साहिबों.....!

ख्वाब....खिलोनों की तरह होते हैं.......
पैर के छालों की तरह फूट गए......
एक जरा सी ठेस लगी और टूट गए......
ए किसी उम्र किसी वक्त के पाबंद नहीं
कभी गुडिया की तरह सोयें गले से लग कर......
कभी कोनों में पड़े रहते हैं बेगानों से....
किसी मनहूस सी आहट पे इशारा पाकर
ध्यान की ताक़ में सजते है...परी कानों से
ख्वाहिशें दिल में खिलाते हैं.....सितारे क्या क्या...
आँख में ख्वाब में का एक चाँद उतर आने से.....
कभी अपनों और कभी बेगानों की तरह होते हैं.......

साहिबों .....!!!
ख्वाब परिंदों की तरह होते हैं.........!!!!..

2 comments:

  1. "ख्वाब परिंदों की तरह होते हैं
    छूना चाहो तो ये उड़ जाते हैं
    और फिर हाथ नहीं आते हैं ..."बधाई

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  2. बहुत सुंदर ! जितनी सार्थक रचना उतनी ही कलात्मक ! शुभकामनायें !
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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