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Friday, October 28, 2011

" अजब दिन थे मोहब्बत के "(दूसरी किस्त)

अजब दिन थे मोहब्बत के...
अजब रातें थी चाहत की.....
कभी गर याद आ जाएँ....
तो पलकों की हथेली पर....
सितारे झिलमिलाते हैं.... !!!. 


हमें अब याद आता है 
बहुत मासूम थे हम भी 
कि हम 
एक अजनबी को 
उम्र की हँसीं  राहों में  
सहारा मान बैठे थे......!!!

 
कि उसके
चाँद से चेहरे को
अपनी खुशनसीबी का
सितारा मान बैठे थे....!!!

हमें मालूम ही कब था ?
कि दश्त-ऐ- जिंदगी में 
सहारे छूट जाते है...
कभी ऐसा भी होता है
नजर जिन पर  ठहरती है ..
वही पे आसमानों से
सितारे   टूट जाते हैं ......!!!

"अजब दिन थे मोहब्बत के
अजब राते थी चाहत की...!!!"

5 comments:

  1. कोमल भावनाओं से गुंथी अच्छी रचना

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  2. आह! हकीकत बयाँ कर दी।

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  3. ..बहुत प्रभावशाली रचना ...बेहतरीन अंदाज़ बात कहने का

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